Modi Ji Ka Safar Nama
नमस्ते दोस्तों! आज हम बात करने जा रहे हैं उस शख्स की, जिसने एक कप चाय से अपनी जिंदगी की शुरुआत की और आज वो देश की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठकर हमें “मन की बात” सुनाता है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं हमारे प्यारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की! एक चायवाला, जो रेलवे स्टेशन पर चाय बेचता था, और आज वो दुनिया भर में “Make In India” का झंडा लहरा रहा है। लेकिन इस सफर में कुछ ऐसे किस्से भी हैं, जो सुनने में थोड़े अजीब और हास्यपूर्ण लगते हैं।
डिजिटल कैमरा, ईमेल, डिग्री न होने की बातें, और मोदी जी की हर कॉमिक चीज़ को शामिल करते हुए, चलिए इस चाय की चुस्की को थोड़े हल्के-फुल्के अंदाज़ में लेते हैं और देखते हैं कि कैसे एक कप चाय की कीमत ने मोदी जी को पीएम तक पहुँचाया।
Safar Nama Chay wale ka – चाय की केतली और डिजिटल कैमरा का सपना
कहते हैं कि नरेंद्र मोदी जी का बचपन गुजरात के वडनगर में बीता। वहाँ वो अपने पिता के साथ रेलवे स्टेशन पर चाय बेचा करते थे। लेकिन ये कोई साधारण चायवाला नहीं था, भाई! ये तो वो चायवाला था, जो चाय बेचते-बेचते देश का भविष्य देख रहा था।
एक बार तो ऐसा हुआ कि एक ट्रेन छूटने वाली थी, और एक साहब चाय माँग रहे थे। मोदी जी, जो उस वक्त छोटे से नन्हे नरेंद्र थे, 100 मीटर दौड़कर ट्रेन के डिब्बे तक चाय पहुँचाने गए। साहब ने चाय पी और बोले, “बेटा, तुम एक दिन बहुत बड़े आदमी बनोगे।” और देखो, वो बात सच हो गई! लेकिन सवाल ये है कि क्या वो साहब चाय की तारीफ कर रहे थे, या फिर मोदी जी की दौड़ने की स्पीड की?
अब उस ज़माने में डिजिटल कैमरा तो था नहीं, लेकिन कहते हैं कि नन्हे नरेंद्र को फोटो खींचने का बड़ा शौक था। वो चाय बेचते-बेचते सोचते थे, “काश, मेरे पास एक डिजिटल कैमरा होता, तो मैं अपनी चाय की दुकान की सेल्फी खींचकर वडनगर का सबसे बड़ा चायवाला बन जाता।”
एक बार तो उन्होंने अपने दोस्त से एक पुराना कैमरा माँगा और चाय की केतली के साथ पोज़ बनाया। लेकिन कैमरे में फिल्म नहीं थी, तो फोटो तो क्या, सिर्फ पोज़ बनाकर ही खुश होना पड़ा। हमारे गाँव के शर्मा जी ने तो कहा, “अगर उस वक्त डिजिटल कैमरा होता, तो मोदी जी चाय बेचते-बेचते इंस्टाग्राम पर वायरल हो गए होते।” सही बात है, शर्मा जी!
गरीबी में विश्व भ्रमण: चाय की केतली और ईमेल का सपना
मोदी जी की गरीबी के किस्से तो ऐसे हैं कि सुनकर लगता है जैसे वो कोई सुपरहीरो की कहानी हो। कहते हैं कि वो अपनी जवानी में हिमालय की सैर पर निकल गए थे। लेकिन सवाल ये है कि गरीबी में हिमालय की सैर कैसे? हमारे गाँव के रमेश भैया तो 500 रुपये लेकर दिल्ली तक नहीं जा पाए, और यहाँ मोदी जी हिमालय की चोटी पर चाय की केतली लेकर पहुँच गए।
एक बार तो ऐसा हुआ कि हिमालय में एक साधु ने उनसे चाय माँगी। मोदी जी ने अपनी जादुई केतली से चाय बनाई और साधु को दी। साधु ने चाय पीकर कहा, “बेटा, तुम एक दिन देश का नेतृत्व करोगे।” अब सवाल ये है कि क्या साधु ने चाय पीकर भविष्य देख लिया, या फिर चाय में इतना अदरक था कि साधु को भविष्य की गर्मी महसूस हो गई?
अब उस वक्त तो इंटरनेट का ज़माना नहीं था, लेकिन कहते हैं कि मोदी जी को टेक्नोलॉजी का बड़ा शौक था। वो सोचते थे, “काश, 1978 में ईमेल होता, तो मैं अपनी चाय की दुकान का ऑर्डर ऑनलाइन ले लेता।”
एक बार तो उन्होंने अपने दोस्त को एक चिट्ठी लिखी और कहा, “भाई, अगर ईमेल होता, तो मैं अपनी चाय की रेसिपी पूरी दुनिया को भेज देता।” लेकिन चिट्ठी डाकखाने में ही गुम हो गई, और चाय की रेसिपी वडनगर तक ही सीमित रह गई। हमारे गाँव के वर्मा जी ने तो कहा, “अगर उस वक्त ईमेल होता, तो मोदी जी चायवाले से पहले ब्लॉगर बन गए होते।” सही बात है, वर्मा जी!
डिग्री का ड्रामा: चायवाले को डिग्री की क्या ज़रूरत?
मोदी जी की डिग्री को लेकर तो बड़ा बवाल हुआ था। कुछ लोगों ने कहा कि उनकी डिग्री फर्जी है, तो कुछ ने कहा कि डिग्री है ही नहीं। लेकिन सवाल ये है कि चायवाले को डिग्री की क्या ज़रूरत? हमारे गाँव के पंडित जी ने तो कहा, “भाई, चाय बेचने के लिए डिग्री चाहिए क्या? चाय की केतली और मुस्कान ही काफी है।” और सच में, मोदी जी ने अपनी मुस्कान और मेहनत से वो कर दिखाया, जो बड़े-बड़े डिग्री वालों के बस की बात नहीं।
एक बार तो एक रैली में उन्होंने कहा, “मैंने चाय बेची है, मुझे डिग्री की नहीं, अनुभव की ज़रूरत थी।” अरे वाह, क्या जवाब था! लेकिन सवाल ये है कि अगर डिग्री नहीं थी, तो फिर वो “पूरी तरह से शिक्षित” (Entire Political Science) डिग्री कहाँ से आई? शायद चाय की केतली में ही छुपी थी!
चायवाला से सीएम तक: चाय की चुस्की से कुर्सी की चमक
मोदी जी की जिंदगी में एक बड़ा टर्निंग पॉइंट तब आया, जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री बने। लेकिन यहाँ भी चायवाले की छवि ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। हर रैली में वो कहते, “मैं चायवाला हूँ।” और जनता तालियाँ बजाती। एक बार तो एक रैली में उन्होंने कहा, “मैंने चाय बेची है, तो मुझे पता है कि देश कैसे चलाना है।” अरे भाई, चाय बेचना और देश चलाना एक ही बात है क्या? लेकिन जनता को ये बात पसंद आई। क्योंकि चायवाले की कहानी में एक मज़ा है – वो हर किसी को अपनी लगती है।
हमारे गाँव के शर्मा जी ने तो कहा, “अगर चाय बेचने से सीएम बना जा सकता है, तो मैं भी चाय की दुकान खोल लेता हूँ।” लेकिन शर्मा जी को चाय बेचने की बजाय चाय पीने में ज़्यादा मज़ा आता है, तो वो दुकान खोलने की बात भूल गए।
मोदी जी की चायवाले वाली इमेज इतनी पॉपुलर हो गई कि एक बार तो एक न्यूज़ चैनल ने हेडलाइन बनाई – “चायवाला से सीएम तक: एक कप चाय की कीमत।” लेकिन सवाल ये है कि क्या चाय बेचने से सीएम बनते हैं? या फिर इसके पीछे मेहनत, लगन, और थोड़ा सा ड्रामा भी था? खैर, जो भी हो, चायवाले की इमेज ने मोदी जी को जनता का हीरो बना दिया।
चायवाला से पीएम तक: एक कप चाय की कीमत
2014 में जब मोदी जी प्रधानमंत्री बने, तो लगा कि अब चायवाले का सपना पूरा हो गया। लेकिन यहाँ भी चाय की कहानी खत्म नहीं हुई। हर रैली में, हर स्पीच में, वो चायवाले की बात करते। एक बार तो उन्होंने कहा, “मैं चायवाला हूँ, मुझे गरीबों का दर्द पता है।” अरे भाई, ठीक है, आप चायवाले थे, लेकिन अब तो आप पीएम हैं। अब तो थोड़ा अमीरों का दर्द भी समझ लो! लेकिन नहीं, चायवाले की इमेज इतनी मज़बूत थी कि लोग आज भी उन्हें “चायवाला पीएम” कहते हैं।
मोदी जी की चायवाले वाली इमेज का सबसे बड़ा फायदा ये हुआ कि वो जनता से कनेक्ट हो गए। एक बार तो एक रैली में एक बूढ़ी अम्मा ने कहा, “बेटा, तुम चायवाले हो, तो मेरे लिए एक कप चाय बना दो।” मोदी जी ने हंसकर कहा, “अम्मा, अब मैं देश की चाय बना रहा हूँ।” अरे वाह, क्या जवाब था! लेकिन सवाल ये है कि देश की चाय में चीनी कब डलेगी? क्योंकि अभी तो चाय थोड़ी कड़वी लग रही है।
नोटबंदी: चायवाले की सबसे बड़ी चाय
2016 में मोदी जी ने नोटबंदी का ऐलान किया। और ये चायवाले की सबसे बड़ी चाय थी। रातोंरात 500 और 1000 के नोट बंद कर दिए गए। जनता बैंकों के बाहर लाइन में लग गई।
हमारे गाँव के वर्मा जी ने तो कहा, “मोदी जी ने चाय बेची है, तो उन्हें पता है कि पैसे की कीमत क्या होती है।” लेकिन जब वर्मा जी 3 घंटे लाइन में खड़े रहे और फिर बैंक से 2000 का नया नोट मिला, तो वो बोले, “भाई, ये तो चाय की कीमत से भी महँगा पड़ गया।” नोटबंदी के बाद लोग इतने फिट हो गए कि बिना जिम गए ही मैराथन दौड़ने लगे। लेकिन सवाल ये है कि क्या नोटबंदी से काला धन खत्म हुआ? या फिर सिर्फ हमारी जेब का धन खत्म हो गया?
विदेश यात्राएँ: चायवाले का वर्ल्ड टूर
मोदी जी की विदेश यात्राएँ तो ऐसी हैं कि लगता है जैसे वो चाय की केतली लेकर वर्ल्ड टूर पर निकल गए हों। अमेरिका, जापान, फ्रांस – हर जगह वो “हग” करके आते हैं।
एक बार तो उन्होंने ओबामा को चाय पिलाई। ओबामा ने चाय पीकर कहा, “ये तो कमाल की चाय है।” लेकिन बाद में पता चला कि चाय में चीनी की जगह गुड़ डाला गया था। ओबामा शायद सोच रहे होंगे, “ये चायवाला तो कुछ अलग ही है।” लेकिन सवाल ये है कि चायवाले की विदेश यात्राओं से हमें क्या मिला?
शायद कुछ फोटोज़ और “मेक इन इंडिया” का स्टीकर। लेकिन असल में चाय की कीमत तो वही रही – 10 रुपये की चाय, 1000 रुपये की फ्लाइट!
स्वच्छ भारत: चायवाले की झाड़ू
2014 में मोदी जी ने स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया। और यहाँ भी चायवाले की छवि काम आई। उन्होंने कहा, “मैं चायवाला हूँ, मुझे साफ-सफाई की अहमियत पता है।” अरे भाई, चाय बेचने और सड़क साफ करने में क्या कनेक्शन है? लेकिन जनता को ये बात पसंद आई।
हर सेलिब्रिटी ने झाड़ू उठाई और सेल्फी खींची। लेकिन सवाल ये है कि क्या भारत साफ हुआ? हमारे गाँव के कूड़ेदान में तो आज भी “स्वच्छ भारत” के पोस्टर ही भरे हैं। शायद चायवाले की झाड़ू से कूड़ा साफ नहीं हुआ, लेकिन सोशल मीडिया पर #SwachhBharat ज़रूर ट्रेंड कर गया।
कोरोना काल: चायवाले की थाली
2020 में जब कोरोना आया, तो मोदी जी ने कहा, “थाली बजाओ, वायरस भगाओ।” और हमने थाली बजा दी। हमारे गाँव के शर्मा जी ने तो इतनी जोर से थाली बजाई कि उनकी थाली टूट गई। लेकिन वायरस नहीं भागा।
फिर मोदी जी ने कहा, “दीया जलाओ।” हमने दीया भी जलाया। लेकिन वायरस फिर भी नहीं गया। आखिर में वैक्सीन आई, और उसका नाम रखा गया “कोविन”। अरे भाई, ये तो चायवाले की मार्केटिंग स्किल है! वैक्सीन का नाम भी ऐसा रखा कि लगे जैसे कोई नया “मेड इन इंडिया” प्रोडक्ट लॉन्च हो रहा हो। लेकिन सवाल ये है कि थाली बजाने से वायरस क्यों भागेगा? शायद वायरस को चायवाले की थाली से डर लगता हो!
डिजिटल इंडिया: चायवाले का डिजिटल कैमरा
मोदी जी ने डिजिटल इंडिया का सपना भी दिखाया। और यहाँ भी उनकी चायवाले वाली इमेज काम आई। एक बार तो उन्होंने कहा, “मैं चायवाला हूँ, मुझे डिजिटल कैमरे की अहमियत पता है।” अरे भाई, चाय बेचने और डिजिटल कैमरे में क्या कनेक्शन है? लेकिन सवाल ये है कि अगर डिजिटल कैमरा इतना पसंद था, तो चाय बेचते वक्त सेल्फी क्यों नहीं खींची?
शायद उस वक्त डिजिटल कैमरे की जगह उनकी मुस्कान ही काफी थी। लेकिन डिजिटल इंडिया के तहत जब हर गाँव में इंटरनेट पहुँचा, तो हमारे गाँव के रमेश भैया ने कहा, “अब मैं भी डिजिटल कैमरे से चाय की दुकान की फोटो खींचकर वायरल करूँगा।” लेकिन रमेश भैया का फोन तो 2G था, तो फोटो वायरल होने की बजाय डिलीट हो गई।
निष्कर्ष: चायवाले का सपना
तो दोस्तों, ये थी चायवाले से पीएम तक की कहानी। एक कप चाय की कीमत ने नरेंद्र मोदी जी को देश का सबसे बड़ा नेता बना दिया। लेकिन इस सफर में कुछ ऐसे किस्से भी हैं, जो सुनने में थोड़े अजीब लगते हैं।
चाय बेचने से लेकर हिमालय की सैर तक, डिजिटल कैमरे का सपना देखने से लेकर ईमेल की कल्पना तक, और डिग्री के बवाल से लेकर थाली बजाने तक – मोदी जी का Safar Nama किसी बॉलीवुड फिल्म से कम नहीं है। लेकिन सवाल ये है कि क्या चायवाले का सपना पूरा हुआ? शायद हाँ, शायद नहीं। लेकिन एक बात तो पक्की है – चायवाले की चाय आज भी 10 रुपये की है, लेकिन उसकी कीमत अब देश की कुर्सी तक पहुँच गई है।
तो अगली बार जब आप चाय पियें, तो जरा सोचिए – शायद आपकी चाय में भी कोई बड़ा सपना छुपा हो!
Disclaimer: यह ब्लॉग पूरी तरह से व्यंग्यात्मक है। इसमें किसी व्यक्ति या विचार का उपहास करने का इरादा नहीं है। हम सब जानते हैं कि मोदी जी का दिमाग़ हमारे वाई-फाई से भी तेज चलता है! 😉