Make In India : शेर की सवारी का सपना

नमस्ते दोस्तों! आज हम बात करने जा रहे हैं उस “शेर” की, जिसे 2014 में हमारे प्यारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने बड़े जोश के साथ लॉन्च किया था। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं “मेक इन इंडिया” की! वो अभियान, जो भारत को मैन्युफैक्चरिंग का हब बनाने का सपना दिखाकर आया था, लेकिन आज लगता है कि शेर की सवारी करने की बजाय हम बस उसकी पूँछ पकड़कर घूम रहे हैं। तो चलिए, इस “मेड इन इंडिया” सपने को थोड़े हल्के-फुल्के अंदाज़ में देखते हैं और जानते हैं कि आखिर ये शेर दहाड़ा क्यों नहीं?

जब मेक इन इंडिया लॉन्च हुआ, तो लगा कि अब भारत की हर गली में फैक्ट्रियाँ खुलेंगी, हर हाथ में “मेड इन इंडिया” का सामान होगा, और हर चीनी दुकानदार हमसे डरकर भागेगा। शेर का लोगो देखकर तो ऐसा लगा जैसे अब हम वाकई में जंगल के राजा बनने जा रहे हैं। लेकिन 10 साल बाद हालात देखिए – शेर तो कहीं दिख नहीं रहा, बस उसकी पूँछ पकड़कर हम “Make In India” का झुनझुना बजा रहे हैं। एक बार तो हमारे पड़ोस के शर्मा जी ने कहा, “मोदी जी ने शेर की सवारी का सपना दिखाया, लेकिन हमें तो साइकिल भी नहीं मिली।” सही बात है, शर्मा जी!

Make In India : चाइना का रीपैकेजिंग मॉडल

मेक इन इंडिया का सबसे बड़ा सपना था कि हम अपने सामान खुद बनाएँ। लेकिन हकीकत क्या है? आज भी हमारे घरों में जो “मेड इन इंडिया” का टैग लगा होता है, उसकी असलियत “असेंबल्ड इन इंडिया” होती है। मतलब, चाइना से सामान मँगवाओ, यहाँ उस पर “मेड इन इंडिया” का स्टीकर चिपकाओ, और बेच दो। एक बार मैंने एक “मेड इन इंडिया” फोन खरीदा। बड़ा गर्व हुआ। लेकिन जब बैटरी खराब हुई, तो सर्विस सेंटर वाले बोले, “भाई, ये तो चाइना का है। पार्ट्स यहाँ नहीं मिलेंगे।” अरे भाई, फिर “मेड इन इंडिया” का स्टीकर क्यों चिपकाया? क्या हम सिर्फ स्टीकर छापने की मशीन बन गए हैं?

ब्यूरोक्रेसी: Make In India का असली विलेन

मेक इन इंडिया का सपना था कि विदेशी कंपनियाँ भारत में फैक्ट्रियाँ लगाएँ। लेकिन हमारी ब्यूरोक्रेसी ने ऐसा माहौल बनाया कि कंपनियाँ भारत आने की बजाय वियतनाम और बांग्लादेश की तरफ भाग गईं। एक बार एक विदेशी कंपनी वाला भारत आया। उसने सोचा, “चलो, मेक इन इंडिया में हिस्सा लेते हैं।” लेकिन जब उसने फैक्ट्री लगाने के लिए परमिशन माँगी, तो उसे 6 महीने तक दफ्तरों के चक्कर काटने पड़े। आखिर में वो बोला, “मैं तो वियतनाम जा रहा हूँ। वहाँ कम से कम परमिशन तो 2 दिन में मिल जाती है।” मेक इन इंडिया का शेर यहाँ दहाड़ने की बजाय कागज़ों में उलझकर रह गया।

Skill India : स्किल तो ठीक, जॉब कहाँ है?

Make In India के साथ Skill India भी लॉन्च हुआ था। कहा गया कि हम युवाओं को स्किल सिखाएँगे, ताकि वो मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में काम कर सकें। लेकिन हकीकत क्या है? स्किल तो सिखा दी, लेकिन जॉब्स कहाँ हैं? एक बार हमारे गाँव के रमेश ने स्किल इंडिया के तहत सिलाई सीखी। 6 महीने बाद वो सर्टिफिकेट लेकर गर्व से बोला, “अब मैं मेक इन इंडिया का हिस्सा बनूँगा।” लेकिन जब फैक्ट्री में जॉब माँगने गया, तो मैनेजर बोला, “भाई, यहाँ तो मशीनें सिलाई करती हैं। तुम्हारी स्किल का क्या करें?” रमेश आज भी गाँव में बैठकर “मेड इन इंडिया” की टी-शर्ट सिल रहा है, लेकिन वो भी चाइना से आए कपड़े से।

Make In India का मेकअप: सिर्फ चमक, अंदर से खोखला

Make In India को चमकाने के लिए बड़े-बड़े इवेंट्स हुए। विदेशी लीडर्स को बुलाया गया, चमचमाते स्टॉल्स लगाए गए, और हर जगह शेर का लोगो चमक रहा था। लेकिन असल में क्या हुआ? एक बार एक इवेंट में मे Make In India का स्टॉल देखा। वहाँ “मेड इन इंडिया” के नाम पर जो सामान रखा था, उसका टैग चेक किया तो लिखा था – “मेड इन चाइना, पैकेज्ड इन इंडिया।” अरे भाई, अगर चाइना से ही सामान मँगवाना था, तो इतना बड़ा इवेंट क्यों किया? सीधे अलीबाबा से ऑर्डर कर लेते! मेक इन इंडिया का मेकअप तो चमक रहा है, लेकिन अंदर से ये खोखला ही है।

Make In India का असली शेर: सोशल मीडिया

अगर Make In India कहीं कामयाब हुआ है, तो वो है सोशल मीडिया। हर बार जब कोई नया प्रोडक्ट लॉन्च होता है, तो ट्विटर पर #MakeInIndia ट्रेंड करने लगता है। लोग सेल्फी लेकर लिखते हैं – “मैंने मेड इन इंडिया खरीदा।” लेकिन जब आप उस प्रोडक्ट को खोलते हैं, तो अंदर “मेड इन चाइना” का टैग चमक रहा होता है। एक बार तो हमारे पड़ोस के वर्मा जी ने “मेड इन इंडिया” का एक पंखा खरीदा। बड़ा गर्व हुआ। लेकिन जब पंखा चला, तो उसकी आवाज़ से ऐसा लगा जैसे वो चीनी भाषा में गाना गा रहा हो। मेक इन इंडिया का शेर सोशल मीडिया पर तो दहाड़ रहा है, लेकिन असल जंगल में वो कहीं गायब है।

निष्कर्ष: सपना तो अच्छा था, लेकिन…

Make In India का सपना वाकई में बहुत अच्छा था। भारत को मैन्युफैक्चरिंग का हब बनाना, नौकरियाँ पैदा करना, और “मेड इन इंडिया” को ग्लोबल ब्रांड बनाना – ये सब सुनने में बहुत अच्छा लगता है। लेकिन हकीकत में ये सपना अभी भी अधूरा है। ब्यूरोक्रेसी, स्किल्स की कमी, और सही प्लानिंग न होने की वजह से मेक इन इंडिया का शेर अभी तक जंगल में दहाड़ नहीं पाया। तो अगली बार जब आप “मेड इन इंडिया” का टैग देखें, तो जरा टैग के पीछे भी देख लें। शायद वहाँ “मेड इन चाइना” की सच्चाई छुपी हो। मेक इन इंडिया – शेर की सवारी का सपना तो अच्छा था, लेकिन अभी तो हम बस उसकी पूँछ पकड़कर घूम रहे हैं!

Disclaimer: यह ब्लॉग पूरी तरह से व्यंग्यात्मक है। इसमें किसी व्यक्ति या विचार का उपहास करने का इरादा नहीं है। हम सब जानते हैं कि मोदी जी का दिमाग़ हमारे वाई-फाई से भी तेज चलता है! 😉

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *