Swachh Bharat – स्वच्छता का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में दो चीज़ें आती हैं – एक तो गांधी जी का चश्मा और दूसरा झाड़ू। भारत में स्वच्छता का सपना कोई नई बात नहीं है। बापू ने कहा था, “स्वच्छता स्वतंत्रता से भी ज़्यादा ज़रूरी है,” और हमने उस बात को इतना गंभीरता से लिया कि आज तक उसकी सफाई कर रहे हैं – कभी सड़कों की, कभी नालियों की, और कभी-कभी अपने दिमाग की। लेकिन 2014 में जब स्वच्छ भारत अभियान शुरू हुआ, तो लगा कि अब बात सिर्फ झाड़ू तक नहीं रहेगी।
अब इसमें कैमरे, सेल्फी स्टिक, और सोशल मीडिया का तड़का भी लगेगा। और सच में, ऐसा ही हुआ। आज स्वच्छता सिर्फ गलियों की गंदगी साफ करने का मिशन नहीं, बल्कि इंस्टाग्राम की स्टोरी और ट्विटर के ट्रेंड का हिस्सा बन चुकी है। तो चलिए, इस सफाई के सफर को थोड़े मज़े, थोड़े तंज, और ढेर सारी हंसी के साथ देखते हैं।
Swachh Bharat – झाड़ू: स्वच्छता का पहला सुपरहीरो
जब मोदी जी के Swachh Bharat अभियान की शुरुआत हुई तो ऐसा लगा जैसे झाड़ू कोई जादुई छड़ी हो। हर गली-मोहल्ले में लोग इसे लेकर निकल पड़े।
बड़े-बड़े नेता, अफसर, और यहाँ तक कि पड़ोस के शर्मा जी भी झाड़ू लिए सड़क पर उतर आए। पहले दिन तो शर्मा जी इतने उत्साहित थे कि झाड़ू को हाथ में लेकर बोले, “आज मैं गली का सुपरमैन हूँ।” लेकिन जैसे ही फोटो खिंच गई और अखबार में छप गई, झाड़ू को कोने में रखकर वो वापस अपने सोफे पर टीवी देखने बैठ गए।
एक बार तो हमारे मोहल्ले के पार्षद साहब ने झाड़ू लेकर सड़क पर इतना जोर-जोर से नारा लगाया कि गली का कुत्ता भी डरकर भाग गया। नारा था – “स्वच्छता हमारा अधिकार है।” लेकिन जब कूड़ा उठाने की बारी आई, तो वो बोले, “ये काम तो सफाईकर्मियों का है, मैं तो सिर्फ प्रेरणा देने आया हूँ।” प्रेरणा तो मिली, पर कूड़ा वहीँ पड़ा रहा।
फोटो खिंचवाने का ऐसा जुनून चढ़ा कि लोग झाड़ू को माइक समझने लगे। एक बार तो एक अंकल जी ने झाड़ू को हाथ में पकड़कर “Swachh Bharat, Swasth Bharat” का ऐसा भाषण दिया कि लगा जैसे वो चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हों। फोटो खिंचने के बाद वो बड़े गर्व से बोले, “देखो, मैंने आज देश की सेवा की।” भाई साहब, देश की सेवा ठीक है, लेकिन वो कूड़े का ढेर जो आपके घर के सामने पड़ा है, उसे कौन उठाएगा?
सोशल मीडिया: स्वच्छता का नया रैंप
फिर आया सोशल मीडिया का दौर। अब झाड़ू हाथ में लेने से ज़्यादा ज़रूरी हो गया #Swachh Bharat लिखना। लोग कूड़े के ढेर के सामने खड़े होकर सेल्फी लेने लगे और कैप्शन डालते – “स्वच्छता मेरा मिशन है।” अरे भाई, मिशन तो ठीक है, लेकिन वो कूड़ा उठाने का मिशन कब शुरू होगा? एक बार तो ट्विटर पर #CleanIndiaChallenge ट्रेंड करने लगा।
लोग एक-दूसरे को नॉमिनेट करने लगे, जैसे ये कोई आइस बकेट चैलेंज हो। फर्क सिर्फ इतना था कि यहाँ पानी की जगह कूड़ा था, और बकेट की जगह पॉलिथीन। एक लड़के ने तो अपने दोस्त को नॉमिनेट करते हुए लिखा, “भाई, तू भी झाड़ू उठा और गली साफ कर।” जवाब आया, “भाई, मैंने झाड़ू उठाई, फोटो खिंची, और अब सो रहा हूँ। गली साफ करने का टाइम कल देखेंगे।”
इंस्टाग्राम पर तो लोग रील्स बनाने लगे। एक भाईसाहब ने झाड़ू लेकर ऐसा डांस किया कि लगा जैसे वो स्वच्छता का माइकल जैक्सन बनने की तैयारी कर रहे हों। कैप्शन था – “झाड़ू मेरा पार्टनर, स्वच्छता मेरा मिशन।” वीडियो वायरल हो गया, लेकिन गली का कूड़ा वायरल होने से रह गया।
सोशल मीडिया पर स्वच्छता का ऐसा क्रेज़ चढ़ा कि लोग कूड़ा साफ करने से ज़्यादा उसकी फोटो अपलोड करने में व्यस्त हो गए। एक बार तो एक लड़की ने कूड़े के ढेर के सामने पोज़ बनाया और लिखा, “स्वच्छता की शुरुआत मुझसे।” कमेंट में किसी ने पूछा, “तो कूड़ा कब उठाओगी?” जवाब आया, “वो तो सफाईवाला उठाएगा, मैं तो बस मोटिवेशन दे रही हूँ।” मोटिवेशन तो मिला, लेकिन कूड़ा फिर भी वहीँ पड़ा रहा।
स्वच्छता के नाम पर स्वैग
कभी-कभी लगता है कि स्वच्छ भारत अभियान कम और स्वैग भारत अभियान ज़्यादा बन गया है। लोग स्टाइलिश झाड़ू खरीदने लगे। मार्केट में लाल हैंडल वाली, नीली वाली, और यहाँ तक कि LED लाइट वाली झाड़ू भी आ गई।
एक बार तो हमारे मोहल्ले के रमेश भैया ने ऐसी झाड़ू खरीदी जो रात में चमकती थी। बोले, “अब रात को भी सफाई करूँगा।” लेकिन रात को वो झाड़ू लेकर सिर्फ सेल्फी खींचते नज़र आए, सफाई का कोई नामोनिशान नहीं। एक दूसरा किस्सा सुनिए – हमारे पड़ोस की राधा दीदी ने झाड़ू को सजाने के लिए उस पर फूलों की माला चढ़ा दी। बोलीं, “झाड़ू भी तो घर का हिस्सा है, इसे सम्मान देना चाहिए।” सम्मान तो ठीक है दीदी, लेकिन उससे कूड़ा कब साफ करेंगी?
लोगों का स्वैग इतना बढ़ गया कि वो झाड़ू लेकर डांस करने लगे। टिकटॉक पर एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक लड़का झाड़ू को पार्टनर बनाकर नाच रहा था। बैकग्राउंड में गाना था – “झाड़ू से झाड़ू मिला दे।” वीडियो को लाखों लाइक्स मिले, लेकिन उसकी गली का कूड़ा किसी ने नहीं देखा। स्वच्छता के नाम पर स्वैग का ये आलम था कि लोग झाड़ू को फैशन स्टेटमेंट बनाने लगे। एक बार तो एक लड़के ने झाड़ू को कंधे पर रखकर फोटो खिंचवाई और लिखा, “स्वच्छता मेरा स्टाइल है।” भाई, स्टाइल तो ठीक है, लेकिन गली का कूड़ा कौन उठाएगा?
सरकार का प्लान और जनता का टाइमपास
सरकार ने भी स्वच्छता के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। जगह-जगह कूड़ेदान लगाए गए, पोस्टर चिपकाए गए, और नारे गढ़े गए। लेकिन हमारी जनता ने उसे भी टाइमपास का साधन बना दिया।
कूड़ेदान के पास खड़े होकर कूड़ा बाहर फेंकने का खेल शुरू हो गया। एक बार तो हमारे मोहल्ले के एक अंकल जी ने कूड़ेदान में कूड़ा डालने की बजाय उसमें अपना पुराना पंखा फेंक दिया। बोले, “ये भी तो कूड़ा ही है।” तर्क इतना मज़बूत था कि पास खड़ा कुत्ता भी शरमा गया। एक दूसरा किस्सा सुनिए – गली में कूड़ेदान लगा तो लोग उसका इस्तेमाल करने की बजाय उसके पास कूड़ा डालने लगे। जब किसी ने पूछा, “कूड़ेदान में क्यों नहीं डाला?” जवाब आया, “अरे, वो तो भरा हुआ है।” कूड़ेदान खाली था, लेकिन जवाब सुनकर कोई कुछ नहीं बोला।
सरकार ने स्वच्छता के लिए ऐप भी लॉन्च किया, जिसमें लोग कूड़े की फोटो अपलोड कर सकते थे। लेकिन हमारी जनता ने उसका भी मजाक बना दिया। लोग कूड़े की फोटो खींचकर अपलोड तो करते, लेकिन कैप्शन में लिखते – “ये कूड़ा मेरे पड़ोसी का है।” पड़ोसी को गाली देने का ऐसा मौका कौन छोड़ता है भला? एक बार तो एक शख्स ने अपने घर के बाहर पड़े कूड़े की फोटो अपलोड की और लिखा, “सरकार कब साफ करेगी?” जवाब में किसी ने कमेंट किया, “भाई, पहले तू उठा तो ले।” लेकिन वो शख्स फिर भी सरकार का इंतज़ार करता रहा।
गाँव से शहर तक: स्वच्छता का अलग-अलग रंग
शहरों में तो फिर भी झाड़ू और सोशल मीडिया का खेल चलता रहा, लेकिन गाँवों में स्वच्छता का मज़ा ही अलग था। एक बार गाँव में स्वच्छता अभियान के तहत लोग झाड़ू लेकर निकले। लेकिन वहाँ सड़क पर कूड़े की बजाय गाय के गोबर का ढेर था। एक अंकल जी ने झाड़ू उठाई और बोले, “ये तो हमारा खाद है, इसे क्यों साफ करें?” तर्क इतना सही था कि सबने झाड़ू नीचे रख दी और चाय पीने चले गए। गाँव में एक और किस्सा हुआ – वहाँ एक कूड़ेदान लगाया गया, लेकिन गाय ने उसे चाट-चाटकर ऐसा हाल कर दिया कि लोग उसमें कूड़ा डालने की बजाय दूर से ही फेंकने लगे। स्वच्छता का सपना गाँव में भी अधूरा ही रहा।
शहरों में हालत ये थी कि लोग कूड़ेदान को देखते ही नाक-मुँह सिकोड़ने लगते। एक बार एक लड़के ने कूड़ेदान के पास सेल्फी ली और लिखा, “स्वच्छता की शुरुआत यहाँ से।” लेकिन फोटो में वो मास्क पहने और नाक दबाए दिख रहा था। कमेंट में किसी ने पूछा, “तो कूड़ा कब उठाओगे?” जवाब आया, “मैं तो सिर्फ प्रेरणा दे रहा हूँ।” प्रेरणा देने का ऐसा जुनून चढ़ा कि लोग कूड़ा उठाने की बजाय उसकी फोटो खींचने में व्यस्त हो गए।
निष्कर्ष: स्वच्छता का सपना अभी अधूरा
हंसी-मज़ाक और तंज को छोड़ दें, तो सच ये है कि स्वच्छ भारत का सपना अभी भी अधूरा है। झाड़ू से लेकर सोशल मीडिया तक, हमने कोशिश तो बहुत की, लेकिन कूड़ा अब भी गलियों में, नालियों में, और कई बार तो हमारे दिमाग में भी जमा है। स्वच्छता सिर्फ फोटो खींचने और हैशटैग लगाने का खेल नहीं है। असली स्वच्छता तब होगी जब हर गली साफ हो, हर नाला चमके, और हर शर्मा जी झाड़ू को माइक न समझें।
तो अगली बार जब आप #Swachh Bharat लिखें, तो जरा कूड़ा भी उठा लें। वरना ये अभियान सिर्फ सोशल मीडिया की स्टोरी बनकर रह जाएगा – 24 घंटे में गायब! स्वच्छता का सपना तभी पूरा होगा जब हम सब मिलकर झाड़ू को सिर्फ फोटो का प्रॉप नहीं, बल्कि असली हथियार बनाएँगे। तब तक, झाड़ू उठाइए, फोटो खींचिए, लेकिन कूड़ा उठाना मत भूलिए। स्वच्छ भारत का सपना आपकी गली से शुरू होता है, सोशल मीडिया से नहीं!
Disclaimer: यह ब्लॉग पूरी तरह से व्यंग्यात्मक है। इसमें किसी व्यक्ति या विचार का उपहास करने का इरादा नहीं है। हम सब जानते हैं कि मोदी जी का दिमाग़ हमारे वाई-फाई से भी तेज चलता है! 😉