Notebandi ka Naatak
8 नवंबर 2016 की वो काली रात, जब टीवी पर एकाएक “बड़ा ऐलान” हुआ। देश के सबसे बड़े “जुमला किंग” ने सूट-बूट में बैठकर कहा, “500 और 1000 के नोट अब कागज का टुकड़ा हैं।” बस फिर क्या था, देशभर में हाहाकार मच गया। बैंकों और एटीएम के बाहर लाइनें ऐसी लगीं, जैसे मुफ्त में सोना बंट रहा हो। पर सोना तो दूर, लोगों को अपने ही पैसे निकालने के लिए घंटों धूप में खड़ा होना पड़ा। आज हम उसी नोटबंदी के नाटक की कहानी सुनाते हैं – लाइन में खड़े लोगों की जुबानी, व्यंग्य के तड़के के साथ। तैयार हो जाइए, क्योंकि ये कहानी हंसी, गुस्से और थोड़े से दर्द का मिश्रण है।
लाइन का पहला हीरो: रामू काका
रामू काका, उम्र 65 साल, गाँव के वो बुजुर्ग जिन्होंने अपनी जिंदगी में पहली बार बैंक की शक्ल देखी। काका को लगा था कि नोटबंदी मतलब नया नोट लेने का मेला है। सुबह 4 बजे उठकर, लाठी टेकते हुए, 5 किलोमीटर पैदल चलकर बैंक पहुँचे। लाइन में 200 लोग पहले से खड़े थे। काका ने पूछा, “भैया, नया नोट कब मिलेगा?” जवाब मिला, “काका, पहले पुराना जमा करो, फिर नंबर आएगा।” काका सोच में पड़ गए, “अरे, पुराना तो मेरे पास गुल्लक में है, वो भी जमा करना पड़ेगा? ये तो लूट है!”
काका को समझ नहीं आया कि काला धन कहाँ गया, पर उनकी कमर जरूर काली पड़ गई। चार घंटे लाइन में खड़े रहने के बाद जब नंबर आया, तो बैंकवाले ने कहा, “काका, आज कैश खत्म। कल आना।” काका ने मन ही मन कहा, “चलो, कम से कम लाइन में खड़े होने का तजुर्बा तो मिला। अगली बार ओलंपिक में हिस्सा लूँगा।”
लाइन की शान: शर्मा जी की बहादुरी
शहर के शर्मा जी, जिन्हें मोहल्ले में “ज्ञान का भंडार” कहा जाता था, वो भी लाइन में थे। शर्मा जी ने पहले दिन ही व्हाट्सएप पर मैसेज फॉरवर्ड किया था, “नोटबंदी से काला धन खत्म, देश तरक्की करेगा।” पर जब खुद लाइन में खड़े हुए, तो सारा ज्ञान हवा हो गया। शर्मा जी के पास 50,000 रुपये के पुराने नोट थे, जो उनकी बीवी ने “छुपाकर” रखे थे। बीवी ने कहा, “इनको जमा कराओ, वरना रोटी बंद।”
शर्मा जी सुबह 6 बजे लाइन में लगे। साथ में पानी की बोतल, टिफिन और एक कुर्सी भी ले गए। लाइन में खड़े-खड़े शर्मा जी ने मोहल्ले की सारी गॉसिप सुनी। किसी ने कहा, “काला धन तो बड़े-बड़े लोग छुपा लेंगे, हम तो बस लाइन में मर रहे हैं।” शर्मा जी ने जवाब दिया, “अरे, ये देशहित में है। थोड़ा कष्ट तो बर्दाश्त करना पड़ेगा।” पर जब 8 घंटे बाद बैंक का शटर गिरा और कैश नहीं मिला, तो शर्मा जी चिल्लाए, “ये देशहित नहीं, देश का नाटक है!”
लाइन की रानी: सुनीता भाभी का जलवा
सुनीता भाभी, मोहल्ले की सबसे तेज-तर्रार औरत। इनके पास पुराने नोटों का बंडल था, जो “ससुराल से आए उपहार” के नाम पर जमा किया गया था। नोटबंदी का ऐलान सुनते ही भाभी ने प्लान बनाया। सुबह 5 बजे मेकअप करके, साड़ी पहनकर बैंक पहुँचीं। सोचा था कि उनकी अदा देखकर बैंक मैनेजर नोट बदल देगा। पर लाइन में 300 लोग पहले से खड़े थे। भाभी ने हिम्मत नहीं हारी। लाइन में खड़े लोगों को बोलीं, “भैया, मुझे आगे जाने दो, बच्चों का टिफिन बनाना है।”
लाइन वालों ने कहा, “भाभी, सबके यहाँ बच्चे भूखे हैं। आप भी इंतजार करो।” सुनीता भाभी चार घंटे खड़ी रहीं। जब नंबर आया, तो बैंकवाले ने कहा, “आधार कार्ड लाईं?” भाभी का चेहरा लाल हो गया। बोलीं, “अरे, आधार कार्ड तो घर पर पड़ा है। क्या मेरी सूरत से पहचान नहीं होती?” जवाब मिला, “भाभी, यहाँ सूरत नहीं, कागज चलता है।” भाभी ने मन में सोचा, “चलो, कम से कम लाइन में खड़े होने का मेडल तो मिलना चाहिए।”
लाइन का ट्विस्ट: भिखारी बाबू का कमाल
लाइन में एक शख्स ऐसा भी था, जिसने सबको हैरान कर दिया। भिखारी बाबू, जो रोज सड़क पर भीख माँगते थे, वो भी बैंक के बाहर खड़े थे। लोगों ने पूछा, “बाबू, तुम यहाँ क्यों?” बाबू ने हँसकर कहा, “अरे, मेरे पास भी 500 का नोट है। पिछले हफ्ते किसी साहब ने दे दिया। अब इसे बदलवाना है।” लाइन में खड़े लोग हँस पड़े, “बाबू, तुम्हारा काला धन कहाँ से आया?”
बाबू ने जवाब दिया, “साहब, मेरा धन काला नहीं, सच्चा है। दिनभर पसीना बहाकर कमाया है।” चार घंटे बाद जब बाबू का नंबर आया, तो बैंकवाले ने कहा, “केवाईसी दो।” बाबू बोले, “क्या बला है ये?” जवाब मिला, “पहचान पत्र।” बाबू ने जेब से एक पुराना फटा हुआ कागज निकाला। बैंकवाले ने मना कर दिया। बाबू हँसते हुए चले गए, “चलो, कम से कम लाइन में खड़े होने का मज़ा तो लिया। नोटबंदी मेरे लिए भी एक नाटक ही सही।”
नोटबंदी का असली नाटक: लाइन में खड़े सपने
लाइन में खड़े हर शख्स की अपनी कहानी थी। कोई शादी के लिए पैसे निकालने आया था, तो कोई दवा के लिए। पर नतीजा सबके लिए एक जैसा – “कैश खत्म, कल आना।” लोग लाइन में खड़े-खड़े सरकार की तारीफ करते थे, “काला धन खत्म हो जाएगा।” पर मन ही मन सोचते थे, “हमारा धन तो लाइन में ही खत्म हो गया।”
कहीं कोई चायवाला चिल्ला रहा था, “चाय लो, चाय! लाइन में ताजगी चाहिए।” तो कहीं कोई ठेले पर समोसे बेच रहा था। नोटबंदी ने लाइन में एक नया बाजार खड़ा कर दिया। लोग पुराने नोटों से चाय खरीदते, और चायवाला हँसता, “साहब, मेरे पास नया नोट है, पर आपको नहीं दूँगा।” ये था नोटबंदी का असली मज़ा – सब एक-दूसरे को मूर्ख बनाते रहे।
Notebandi ka Naatak – सरकार का दावा और लाइन का सच
सरकार कहती थी, “काला धन बाहर आएगा। आतंकवाद खत्म होगा।” पर लाइन में खड़े लोगों को न काला धन दिखा, न आतंकवाद। हाँ, उनके पैरों में छाले जरूर पड़ गए। एक भाई साहब तो लाइन में खड़े-खड़े सो गए। सपने में देखा कि वो नए नोटों से घर बना रहे हैं। जागे तो पता चला, लाइन अभी भी वहीँ है।
लाइन में खड़े लोग आपस में बहस करते, “भाई, ये सब देश के लिए है।” दूसरा बोलता, “देश के लिए है तो बड़े-बड़े लोग लाइन में क्यों नहीं?” सवाल बजा था, पर जवाब किसी के पास नहीं। Notebandi ka Naatak चलता रहा, और लाइन में खड़े लोग डायलॉग बोलते रहे।
अंत में हँसी का ठहाका
8 नवंबर से शुरू हुआ ये नाटक महीनों चला। लोग लाइन में खड़े हुए, पसीना बहाया, गुस्सा किया, और फिर हँस पड़े। क्योंकि हिंदुस्तान में अगर हँसना न आए, तो जीना मुश्किल है। नोटबंदी का असली सबक यही था – जुमले सुनो, लाइन में लगो, और मज़े लो। काला धन तो कहीं गया नहीं, पर लाइन में खड़े लोगों की कहानियाँ जरूर रंगीन हो गईं।
तो दोस्तों, अगली बार जब कोई “बड़ा ऐलान” हो, तो लाठी, कुर्सी और चाय का इंतजाम करके लाइन में लग जाना। क्योंकि नोटबंदी का नाटक खत्म नहीं हुआ, बस इंटरवल चल रहा है।
Disclaimer: यह ब्लॉग पूरी तरह से व्यंग्यात्मक है। इसमें किसी व्यक्ति या विचार का उपहास करने का इरादा नहीं है। हम सब जानते हैं कि मोदी जी का दिमाग़ हमारे वाई-फाई से भी तेज चलता है! 😉