Ganga Safai – पानी साफ हुआ या सिर्फ फोटो?
नमस्ते दोस्तों! आज हम बात करने जा रहे हैं उस पवित्र सपने की, जिसे हमारे प्यारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 2014 में शुरू किया – “नमामि गंगे”। एक ऐसा अभियान, जो गंगा नदी को साफ करने का वादा लेकर आया, जहाँ पानी इतना स्वच्छ हो कि मछलियाँ भी सेल्फी लेने लगें! लेकिन क्या सचमुच गंगा का पानी साफ हुआ, या ये बस मंच पर फोटो सेशन और सोशल मीडिया के लिए एक शानदार जुमला बनकर रह गया? चलिए, इस मज़ेदार सफर को हल्के-फुल्के अंदाज़ में एक्सप्लोर करते हैं, जहाँ व्यंग्य के साथ-साथ कुछ गंभीर मुद्दों की भी चटनी लगाएँगे।
नमामि गंगे का आगाज: मंच से मछली तक
2014 में जब मोदी जी ने गंगा सफाई का ऐलान किया, तो लगा कि अब गंगा में स्नान करने वाले लोग नहाने के बाद परफ्यूम की जगह गुलाब जल छिड़केंगे। मंच पर उन्होंने कहा, “गंगा माँ की सेवा हमारा धर्म है।” जनता ने तालियाँ बजाई, और हमारे गाँव के शर्मा जी बोले, “अब तो गंगा में तैराकी का मज़ा आएगा!” हahaha, शर्मा जी, आपकी सोच तो कमाल की है! लेकिन सवाल ये है कि क्या गंगा सचमुच साफ हुई, या बस फोटो खिंचवाने का एक नया बहाना बन गया?
मोदी जी का सपना था कि 2020 तक गंगा को प्रदूषण से मुक्त कर दिया जाए। 20,000 करोड़ रुपये का बजट लगा, सैकड़ों प्रोजेक्ट्स शुरू हुए, और हर साल गंगा किनारे फोटो सेशन हुए। लेकिन आज 2025 में हालत क्या है? चलिए, पड़ताल करते हैं – हँसी-मज़ाक के साथ, ज़ाहिर है!
पानी साफ हुआ या फोटो क्लिक हुई?
नमामि गंगे के तहत गंगा के किनारे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स लगाए गए, और दावे किए गए कि प्रदूषण 70% कम हो गया। लेकिन हमारे गाँव के रमेश भैया ने तो कहा, “भाई, मैंने गंगा में नहाया, लेकिन बदबू से नाक बंद हो गई!” हahaha, रमेश भैया, शायद आपने गलत जगह नहाई! एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में भी गंगा में जैविक ऑक्सीजन डिमांड (BOD) 4 मिलीग्राम प्रति लीटर से ऊपर थी, जो प्रदूषण का संकेत है। तो क्या पानी साफ हुआ, या बस फोटो में साफ दिख रहा है?
एक मज़ेदार किस्सा है। एक बार मोदी जी ने गंगा किनारे फोटो खिंचवाया, जहाँ पानी साफ दिख रहा था। लेकिन स्थानीय लोगों ने बताया कि उस दिन खासतौर पर पानी को रंगीन किया गया था! हाँ, आपने सही पढ़ा – रंगीन पानी से फोटोशॉप का काम आसान हो गया। लगता है, गंगा सफाई का असली मकसद पर्यावरण नहीं, बल्कि इंस्टाग्राम था!
सीवेज प्लांट्स: जादू की छड़ी या जुमले की मशीन?
नमामि गंगे के तहत 100 से ज्यादा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स लगाए गए, जिनका दावा था कि गंदा पानी साफ होकर गंगा में जाएगा। लेकिन हमारे गाँव की चाची ने तो कहा, “ये प्लांट तो दिखावे के हैं, गंदगी वहीँ बह रही है!” हahaha, चाची जी, आपकी आँखें सही देख रही हैं। एक 2022 की रिपोर्ट कहती है कि इन प्लांट्स की क्षमता 50% से कम है, और ज्यादातर खराब पड़े हैं। तो क्या ये जादू की छड़ी हैं, जो गंदगी को साफ करती हैं, या बस मंच पर दिखाने की मशीनें?
एक बार तो एक प्लांट का उद्घाटन हुआ, और अगले दिन ही वहाँ से काला पानी बहने लगा। स्थानीय लोगों ने शिकायत की, लेकिन जवाब मिला, “अरे, ये तो टेस्टिंग फेज़ है!” हाँ, टेस्टिंग फेज़ जो 10 साल से चल रहा है। लगता है, गंगा सफाई का असली टेस्ट तो अभी बाकी है!
मछलियाँ और सेल्फी: गंगा का नया ट्रेंड
मोदी जी ने कहा था कि गंगा साफ होने पर मछलियाँ लौट आएँगी। लेकिन हमारे गाँव के वर्मा जी ने तो कहा, “मछली तो दूर, कचरा ही तैर रहा है!” हahaha, वर्मा जी, शायद मछलियाँ सेल्फी लेने में व्यस्त हैं! एक मज़ेदार किस्सा है – एक पर्यटक ने गंगा में मछली देखने की कोशिश की, लेकिन उसे प्लास्टिक की बोतल मिली, जिस पर “नमामि गंगे” लिखा था! हाँ, आपने सही पढ़ा – सफाई अभियान का कचरा ही नदी में तैर रहा है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में गंगा में प्लास्टिक कचरे की मात्रा 1 लाख टन से ऊपर थी। तो क्या मछलियाँ लौटीं, या बस फोटोग्राफरों की भीड़ बढ़ गई? लगता है, गंगा का नया ट्रेंड सेल्फी पॉइंट्स हैं, न कि साफ पानी!
औद्योगिक प्रदूषण: गंगा का दुश्मन नंबर वन
गंगा को प्रदूषित करने में औद्योगिक कचरे का बड़ा हाथ है। नमामि गंगे के तहत दावे हुए कि फैक्ट्रियों से निकलने वाला जहरीला पानी रोका जाएगा। लेकिन हमारे गाँव के पंडित जी ने तो कहा, “ये फैक्ट्रियाँ तो गंगा में जहर उड़ेल रही हैं, और हम पूजा कर रहे हैं!” हahaha, पंडित जी, आपकी बात सही है। एक 2023 की रिपोर्ट कहती है कि उत्तर प्रदेश और बिहार के 200 से ज्यादा कारखानों से गंगा में प्रतिदिन 500 मिलियन लीटर गंदा पानी बहता है।
एक मज़ेदार किस्सा है – एक फैक्ट्री मालिक ने कहा, “हमने गंदा पानी रोक दिया, अब साफ पानी बहा रहे हैं!” लेकिन साफ पानी में भी रंग था, जो फोटो के लिए डाला गया था! तो क्या औद्योगिक प्रदूषण कम हुआ, या बस मंच पर सफाई का ढोंग हुआ?
किसानों का दर्द: गंगा का पानी कहाँ?
गंगा सफाई का एक मकसद था कि साफ पानी किसानों तक पहुँचे। लेकिन हमारे गाँव के रमेश भैया ने तो कहा, “गंगा का पानी साफ नहीं हुआ, और जो है, वो भी नहरों में नहीं पहुँच रहा!” हahaha, रमेश भैया, शायद पानी विदेश यात्रा पर चला गया! एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में गंगा के 60% पानी का इस्तेमाल सिंचाई के लिए नहीं हो पाया, क्योंकि बुनियादी ढाँचे की कमी थी।
किसानों की हालत खराब है – सूखा, बाढ़, और कर्ज़। एक एनजीओ की रिपोर्ट कहती है कि 2023 में 5000 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की, क्योंकि पानी और संसाधन नहीं मिले। तो क्या गंगा सफाई ने किसानों को राहत दी, या बस फोटो के लिए नहरों में पानी छोड़ा गया?
पर्यटन: गंगा का नया बिजनेस
गंगा साफ होने का एक फायदा पर्यटन को होना था। लेकिन हमारे गाँव की चाची ने तो कहा, “पर्यटक तो आते हैं, लेकिन कचरा छोड़कर चले जाते हैं!” हahaha, चाची जी, आपकी बात सही है। हरिद्वार और वाराणसी में पर्यटकों की संख्या बढ़ी, लेकिन कचरे की भी। एक 2023 की रिपोर्ट कहती है कि वाराणसी में प्रतिदिन 20 टन कचरा गंगा किनारे जमा होता है।
एक मज़ेदार किस्सा है – एक पर्यटक ने गंगा में डुबकी लगाई और बोला, “वाह, कितना साफ पानी!” लेकिन अगले मिनट उसकी जेब से प्लास्टिक की बोतल गंगा में गिर गई! तो क्या पर्यटन बढ़ा, या गंगा का कचरा बढ़ा?
निष्कर्ष: पानी साफ या फोटो साफ?
तो दोस्तों, ये थी गंगा सफाई की मज़ेदार कहानी। नमामि गंगे का सपना सुंदर था – साफ पानी, लौटती मछलियाँ, और खुशहाल किसान। लेकिन हकीकत में प्रदूषण, औद्योगिक कचरा, और बुनियादी ढाँचे की कमी ने इसे फोटो सेशन तक सीमित कर दिया। 20,000 करोड़ खर्च हुए, लेकिन गंगा का पानी अभी भी कहानी कहता है – हँसी की, और दर्द की। तो अगली बार जब आप गंगा किनारे जाएँ, तो जरा पानी को देखें – क्या ये साफ है, या बस फोटो के लिए चमक रहा है?