Bullet Train – सपना या सवारी का इंतज़ार? – एक हास्यपूर्ण व्यंग्य
नमस्ते दोस्तों! आज हम बात करने जा रहे हैं उस चमकते-दमकते सपने की, जिसे हमारे प्यारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 2017 में जापान के साथ मिलकर शुरू किया – “बुलेट ट्रेन”। एक ऐसी ट्रेन, जो 320 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ेगी, और हमें लगेगा कि हम जापान में नहीं, बल्कि किसी बॉलीवुड फिल्म के सेट पर हैं! लेकिन क्या ये सपना सचमुच सवारी बन पाया, या अभी भी हम इंतज़ार में खड़े हैं? चलिए, इस मज़ेदार सफर को हल्के-फुल्के अंदाज़ में एक्सप्लोर करते हैं, जहाँ व्यंग्य के साथ-साथ कुछ गंभीर मुद्दों की भी चटनी लगाएँगे।
बुलेट ट्रेन का आगाज: मंच से मायावी रफ्तार
2017 में जब मोदी जी और जापानी PM शिंजो आबे ने अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट की नींव रखी, तो लगा कि अब भारत की रफ्तार दुनिया को पीछे छोड़ देगी। मंच पर उन्होंने कहा, “ये ट्रेन समय बचाएगी और तरक्की लाएगी।” जनता ने तालियाँ बजाई, और हमारे गाँव के शर्मा जी बोले, “अब तो मैं भी बुलेट ट्रेन से चाय बेचने जाऊँगा!” हahaha, शर्मा जी, आपकी सोच तो कमाल की है! लेकिन सवाल ये है कि क्या बुलेट ट्रेन सचमुच दौड़ पाई, या अभी भी ट्रैक पर धूल जमा हो रही है?
प्रोजेक्ट का दावा था कि 2022 तक ट्रेन चलने लगेगी, और 1.08 लाख करोड़ रुपये का बजट लगा। जापान ने तकनीक और 80% फंड दिया, लेकिन आज 2025 में हालत क्या है? चलिए, पड़ताल करते हैं – हँसी-मज़ाक के साथ, ज़ाहिर है!
सवारी का इंतज़ार: ट्रेन कहाँ है भाई?
बुलेट ट्रेन का सपना देखते-देखते 8 साल बीत गए, लेकिन ट्रेन अभी भी कागज़ों में दौड़ रही है। हमारे गाँव के रमेश भैया ने तो कहा, “भाई, बुलेट ट्रेन का टिकट तो नहीं मिला, लेकिन गड्ढों में गिरी साइकिल की मरम्मत करानी पड़ी!” हahaha, रमेश भैया, शायद आपकी साइकिल बुलेट से तेज़ थी! एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 तक सिर्फ 20% काम पूरा हुआ, और 2026 से पहले ट्रेन चलने की उम्मीद कम है। तो क्या ये सवारी का इंतज़ार है, या सपना का धोखा?
एक मज़ेदार किस्सा है। एक बार अहमदाबाद स्टेशन पर लोग बुलेट ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे, लेकिन ट्रेन की जगह एक स्लो लोकल आ गई। लोगों ने शिकायत की, तो जवाब मिला, “अरे, ये तो बुलेट ट्रेन का ट्रायल वर्जन है!” हाँ, ट्रायल वर्जन जो 30 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल रहा था!
लागत का खेल: बुलेट या बुलेटप्रूफ बजट?
बुलेट ट्रेन का बजट 1.08 लाख करोड़ से शुरू हुआ, लेकिन अब 1.5 लाख करोड़ की बात हो रही है। हमारे गाँव की चाची ने तो कहा, “ये तो मेरे पूरे गाँव की चाय की दुकानें बेचकर भी नहीं बनेगी!” हahaha, चाची जी, आपकी गणना सही है। एक 2023 की रिपोर्ट कहती है कि लागत बढ़ने की वजह भूमि अधिग्रहण, कानूनी विवाद, और देरी है। तो क्या ये बुलेट ट्रेन है, या बुलेटप्रूफ बजट का खेल?
एक मज़ेदार किस्सा है – एक किसान ने अपनी ज़मीन के लिए मुआवजा माँगा, तो उसे बुलेट ट्रेन का मॉडल दिखाया गया! किसान बोला, “भाई, मॉडल तो अच्छा है, लेकिन मेरा खेत कहाँ गया?” लगता है, बुलेट ट्रेन की रफ्तार से ज़मीनें गायब हो गईं!
जापान का साथ: चाय या तकनीक?
जापान ने बुलेट ट्रेन के लिए 80% फंड और तकनीक दी, लेकिन हमारे गाँव के वर्मा जी ने तो कहा, “भाई, जापान ने ट्रेन दी, लेकिन हमने चाय पिलाई!” हahaha, वर्मा जी, आपकी बात में दम है। जापान की शिंकानसेन तकनीक भारत में फिट करने की कोशिश हो रही है, लेकिन मिट्टी, मौसम, और ट्रैक की चुनौतियाँ हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में 30% ट्रैक निर्माण में देरी हुई क्योंकि जापानी इंजीनियरों को भारतीय मसालों की आदत नहीं पड़ी! तो क्या जापान का साथ ट्रेन लाएगा, या चाय की महफिल बढ़ाएगा?
एक मज़ेदार किस्सा है – एक जापानी इंजीनियर ने पूछा, “ये ट्रेन कब चलेगी?” जवाब मिला, “जब तक चाय की चुस्की खत्म नहीं होती!” हाँ, चायवाले का जादू जापान तक पहुँच गया!
किसानों का दर्द: ट्रेन की राह में खेत
बुलेट ट्रेन के लिए 1400 हेक्टेयर ज़मीन अधिग्रहण हुई, और किसानों का रोना शुरू हो गया। हमारे गाँव के रमेश भैया ने तो कहा, “मेरा खेत गया, और बदले में बुलेट ट्रेन का वादा मिला!” हahaha, रमेश भैया, शायद आपकी फसल ट्रेन में चढ़ जाएगी! एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में 500 से ज्यादा किसानों ने मुआवजे को लेकर विरोध किया, और कई मामलों में हिंसा हुई।
एक मज़ेदार किस्सा है – एक किसान ने ट्रेन के रास्ते में ट्रैक्टर खड़ा कर दिया और बोला, “बुलेट ट्रेन से पहले मेरा मुआवजा चाहिए!” लेकिन जवाब मिला, “अरे, ट्रेन तो स्मार्ट है, तुम्हारा ट्रैक्टर नहीं!” तो क्या किसानों का दर्द कम हुआ, या ट्रेन की राह में उनका खेत कुर्बान हो गया?
पर्यावरण: बुलेट की हवा या प्रदूषण?
बुलेट ट्रेन को पर्यावरण के लिए बेहतर बताया गया, लेकिन निर्माण में पेड़ काटे गए। हमारे गाँव के पंडित जी ने तो कहा, “ये बुलेट ट्रेन हवा देगी, लेकिन पेड़ों की हवा ले गई!” हahaha, पंडित जी, आपकी बात सही है। एक 2023 की रिपोर्ट कहती है कि प्रोजेक्ट के लिए 2 लाख से ज्यादा पेड़ काटे गए, और कार्बन उत्सर्जन बढ़ा। तो क्या बुलेट ट्रेन हवा साफ करेगी, या प्रदूषण की नई कहानी लिखेगी?
एक मज़ेदार किस्सा है – एक पर्यावरणविद ने पूछा, “पेड़ों की भरपाई कैसे होगी?” जवाब मिला, “अरे, ट्रेन इतनी तेज़ होगी कि पेड़ों को दिखाई ही नहीं देगा!” हाँ, स्मार्ट जवाब!
आम आदमी: सवारी या सपना?
बुलेट ट्रेन का किराया 3000-4000 रुपये प्रति टिकट होने का अनुमान है। हमारे गाँव की चाची ने तो कहा, “ये तो मेरे एक महीने के राशन का दाम है!” हahaha, चाची जी, आपकी गणना सटीक है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, बुलेट ट्रेन आम आदमी की पहुँच से बाहर होगी, और ज्यादातर अमीर और कारोबारी इसका इस्तेमाल करेंगे। तो क्या ये सवारी होगी, या बस सपना?
एक मज़ेदार किस्सा है – एक यात्री ने पूछा, “कब तक इंतज़ार करना पड़ेगा?” जवाब मिला, “जब तक आपका बैंक बैलेंस बुलेट ट्रेन के टिकट के बराबर न हो जाए!” लगता है, सवारी का इंतज़ार लंबा है!
निष्कर्ष: सपना या सवारी?
तो दोस्तों, ये थी बुलेट ट्रेन की मज़ेदार कहानी। सपना तो शानदार था – तेज़ रफ्तार, चमकता ट्रैक, और तरक्की। लेकिन हकीकत में देरी, लागत, किसानों का दर्द, और पर्यावरणीय चिंताएँ इसे अधूरा छोड़ दिया। 1.5 लाख करोड़ खर्च होने को हैं, लेकिन सवारी अभी सपने में ही दौड़ रही है। शायद बुलेट ट्रेन शहरों को जोड़े, लेकिन गाँवों के लिए ये बस एक मंचीय जुमला बनकर रह गया। तो अगली बार जब आप बुलेट ट्रेन की बात सुनें, तो जरा सोचें – क्या ये सवारी है, या इंतज़ार का एक नया बहाना?