Smart City – क्या गाँव स्मार्ट हो गए? – एक हास्यपूर्ण व्यंग्य

नमस्ते दोस्तों! आज हम बात करने जा रहे हैं उस चमकते-दमकते सपने की, जिसे हमारे प्यारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 2015 में लॉन्च किया – “स्मार्ट सिटी मिशन“। एक ऐसा अभियान, जो शहरों को स्मार्ट बनाने का वादा लेकर आया, जहाँ सड़कें चमकें, ट्रैफिक अपने-आप चले, और गाँव भी स्मार्टफोन की तरह चमक उठें! लेकिन क्या सचमुच गाँव स्मार्ट हो गए, या ये बस मंच पर एक शानदार फोटो सेशन बनकर रह गया? चलिए, इस मज़ेदार सफर को हल्के-फुल्के अंदाज़ में एक्सप्लोर करते हैं, जहाँ व्यंग्य के साथ-साथ कुछ गंभीर मुद्दों की भी चटनी लगाएँगे।

स्मार्ट सिटी का आगाज: मंच से मायावी सपना

2015 में जब मोदी जी ने स्मार्ट सिटी का ऐलान किया, तो लगा कि अब हर गाँव में Wi-Fi, स्मार्ट लाइट्स, और ड्रोन डिलीवरी होगी। मंच पर उन्होंने कहा, “हमारा सपना है कि भारत के हर कोने में स्मार्टनेस हो।” जनता ने तालियाँ बजाई, और हमारे गाँव के शर्मा जी बोले, “अब तो मैं भी स्मार्टफोन से गाय चराऊँगा!” हahaha, शर्मा जी, आपकी सोच तो कमाल की है! लेकिन सवाल ये है कि क्या गाँव सचमुच स्मार्ट हुए, या बस शहरों की चमक गाँव तक पहुँचने से पहले गायब हो गई?

स्मार्ट सिटी मिशन के तहत 100 शहरों को चुना गया, और 2 लाख करोड़ रुपये का बजट लगा। दावे किए गए कि सड़कें चमकेंगी, पानी साफ होगा, और गाँव भी इससे फायदा उठाएँगे। लेकिन आज 2025 में हालत क्या है? चलिए, पड़ताल करते हैं – हँसी-मज़ाक के साथ, ज़ाहिर है!

गाँव स्मार्ट हुए या फोटो स्मार्ट हुई?

स्मार्ट सिटी का सपना शहरों तक सीमित रहा, लेकिन गाँवों को भी स्मार्ट बनाने की बात कही गई। हमारे गाँव के रमेश भैया ने तो कहा, “भाई, स्मार्ट सिटी आई, लेकिन मेरी गली में गड्ढा वहीँ है!” हahaha, रमेश भैया, शायद आपका गाँव स्मार्टनेस की लाइन में नहीं था! एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 तक सिर्फ 40% चुने गए शहरों में स्मार्ट प्रोजेक्ट्स पूरे हुए, और गाँवों का तो ज़िक्र ही नहीं। तो क्या गाँव स्मार्ट हुए, या बस फोटो में स्मार्ट दिख रहे हैं?

एक मज़ेदार किस्सा है। एक बार हमारे गाँव में स्मार्ट स्ट्रीट लाइट लगाई गई। लोग खुशी से नाचने लगे, लेकिन अगले दिन बिजली चली गई। रमेश भैया ने कहा, “अब तो स्मार्ट लाइट का मतलब है – स्मार्ट तरीके से अंधेरा!” हास्यास्पद है, लेकिन सच्चाई यही है। गाँवों में बुनियादी सुविधाएँ नहीं, तो स्मार्टनेस कहाँ से आएगी?

सड़कें चमकीं या गड्ढों में डूबीं?

स्मार्ट सिटी का एक वादा था चमकती सड़कें। लेकिन हमारे गाँव की चाची ने तो कहा, “सड़क तो बन गई, लेकिन बारिश में गड्ढा बन गया!” हahaha, चाची जी, आपकी बात सही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में 60% ग्रामीण सड़कें खराब हालत में थीं, जबकि स्मार्ट सिटी के नाम पर शहरों में ही फंड खर्च हुआ। तो क्या सड़कें चमकीं, या गड्ढों में डूब गईं?

एक मज़ेदार किस्सा है – एक स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में सड़क बनाई गई, लेकिन उद्घाटन के बाद अगले हफ्ते ही बारिश ने उसे धो दिया। स्थानीय लोगों ने शिकायत की, लेकिन जवाब मिला, “अरे, ये तो स्मार्ट डिज़ाइन है – बारिश में गड्ढा बनकर पानी जमा करे!” हाँ, स्मार्टनेस का नया मतलब सीख लिया!

पानी और बिजली: स्मार्ट सपने का धोखा

स्मार्ट सिटी का एक लक्ष्य था साफ पानी और 24×7 बिजली। लेकिन हमारे गाँव के वर्मा जी ने तो कहा, “पानी तो आता है, लेकिन गंदा, और बिजली 2 घंटे!” हahaha, वर्मा जी, शायद आपका गाँव स्मार्टनेस की कतार में नहीं था! एक 2023 की रिपोर्ट कहती है कि ग्रामीण इलाकों में सिर्फ 30% घरों को 24×7 बिजली मिली, और साफ पानी की सप्लाई 40% ही है।

एक मज़ेदार किस्सा है – एक गाँव में स्मार्ट वाटर मीटर लगा, लेकिन पानी की सप्लाई नहीं थी। लोग मीटर देखकर हँसते थे, “ये तो स्मार्ट नहीं, मूक गवाह है!” तो क्या पानी और बिजली स्मार्ट हुई, या बस मीटर स्मार्ट हो गए?

शिक्षा और स्वास्थ्य: स्मार्ट कहाँ?

स्मार्ट सिटी का सपना था कि शिक्षा और स्वास्थ्य डिजिटल हो जाएँ। लेकिन हमारे गाँव के स्कूल में तो टीचर नहीं, फिर स्मार्ट क्लास कैसे? रमेश भैया की बेटी ने कहा, “पापा, टीचर नहीं हैं, तो मैं स्मार्टफोन पर गाने सुनती हूँ!” हahaha, रमेश भैया, आपकी बेटी तो स्मार्टनेस का सही इस्तेमाल कर रही है! एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में ग्रामीण स्कूलों में सिर्फ 25% में स्मार्ट क्लास थीं।

स्वास्थ्य में भी हालत वैसे ही हैं। गाँवों में डॉक्टर नहीं, और स्मार्ट हेल्थ सेंटर का सपना अधूरा। एक बार तो चाची जी ने स्मार्ट हेल्थ ऐप ट्राई किया, लेकिन नेटवर्क नहीं था। डॉक्टर ने कहा, “आपको सर्दी है या बुखार, ये तो सिग्नल बताएगा!” तो क्या शिक्षा और स्वास्थ्य स्मार्ट हुए, या बस सपने बेचे गए?

बेरोजगारी: स्मार्ट जॉब का इंतज़ार

स्मार्ट सिटी से नौकरियाँ आने का वादा था। लेकिन हमारे गाँव के युवा आज भी फोन पर गेम खेलते हैं, क्योंकि जॉब नहीं मिली। एक एनएसएसओ रिपोर्ट कहती है कि 2024 में बेरोजगारी दर 8% से ऊपर रही, खासकर ग्रामीण इलाकों में। रमेश भैया ने तो कहा, “स्मार्ट सिटी से तो सिर्फ स्मार्ट बेरोजगारी आई है!” हahaha, रमेश भैया, आपकी बात में दम है।

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स में ज्यादातर नौकरियाँ शहरों में गईं, और गाँवों के लिए कुछ नहीं बचा। एक युवा ने बताया, “मैंने स्मार्ट ट्रेनिंग ली, लेकिन नौकरी के लिए शहर जाना पड़ा।” तो क्या स्मार्टनेस गाँवों तक पहुँची, या बस शहरों की चमक बढ़ी?

फंड का फेर: स्मार्ट बजट कहाँ गया?

स्मार्ट सिटी पर 2 लाख करोड़ रुपये खर्च होने का दावा है। लेकिन हमारे गाँव के पंडित जी ने तो कहा, “ये पैसा तो शहरों में चला गया, हमारे गाँव में तो गड्ढा वहीँ है!” हahaha, पंडित जी, आपकी आँखें सही देख रही हैं। एक 2023 की रिपोर्ट कहती है कि 70% फंड शहरों के प्रोजेक्ट्स में खर्च हुआ, जबकि गाँवों का हिस्सा न के बराबर था।

एक मज़ेदार किस्सा है – एक गाँव में स्मार्ट प्रोजेक्ट के लिए बोर्ड लगा, लेकिन काम शुरू नहीं हुआ। लोग बोले, “ये तो स्मार्ट बोर्ड है, स्मार्ट काम नहीं!” तो क्या फंड स्मार्ट इस्तेमाल हुआ, या बस कागज़ों में स्मार्ट दिखा?

निष्कर्ष: गाँव स्मार्ट या सपना फ्लॉप?

तो दोस्तों, ये थी स्मार्ट सिटी की मज़ेदार कहानी। सपना तो सुंदर था – चमकती सड़कें, साफ पानी, और स्मार्ट गाँव। लेकिन हकीकत में गड्ढे, बेरोजगारी, और बुनियादी सुविधाओं की कमी ने इसे अधूरा छोड़ दिया। 2 लाख करोड़ खर्च हुए, लेकिन गाँव अभी भी स्मार्टनेस की राह देख रहे हैं। शायद स्मार्ट सिटी शहरों को स्मार्ट बनाए, लेकिन गाँवों के लिए ये बस एक मंचीय जुमला बनकर रह गया। तो अगली बार जब आप स्मार्ट सिटी की बात सुनें, तो जरा अपने गाँव की गली में झाँक लें – क्या वो स्मार्ट है, या बस फोटो के लिए चमक रहा है?

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