Digital India : गाँव में 4G या सिर्फ जुमला?

नमस्ते दोस्तों! आज हम बात करने जा रहे हैं उस सपने की, जिसे हमारे प्यारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 2015 में लॉन्च किया था – “डिजिटल इंडिया”। एक ऐसा अभियान, जो हर गाँव में 4G इंटरनेट, स्मार्टफोन, और डिजिटल सुविधाओं का वादा लेकर आया था। लेकिन क्या सचमुच गाँवों में 4G की स्पीड से इंटरनेट दौड़ रहा है, या ये बस एक और मंचीय जुमला बनकर रह गया? चलिए, इस मज़ेदार सफर को हल्के-फुल्के अंदाज़ में एक्सप्लोर करते हैं, जहाँ व्यंग्य के साथ-साथ कुछ गंभीर मुद्दों की भी चटनी लगाएँगे।

डिजिटल इंडिया का आगाज: मंच से सपना

2015 में जब मोदी जी ने डिजिटल इंडिया का ऐलान किया, तो लगा कि अब हर गाँव में वाई-फाई का जाल बिछेगा, और किसान भी ट्वीट करके मौसम की जानकारी ले लेंगे। मंच पर उन्होंने कहा, “हर हाथ में स्मार्टफोन, हर गाँव में इंटरनेट।” जनता ने तालियाँ बजाई, और हमारे गाँव के शर्मा जी ने तो कहा, “अब तो मैं भी फेसबुक पर फोटो डालूँगा!” लेकिन शर्मा जी का फोन अभी भी 2G पर अटका है, और फोटो अपलोड होने की बजाय डिलीट हो जाती है। हahaha, शर्मा जी, डिजिटल इंडिया का जादू अभी आपके गाँव तक नहीं पहुँचा!

मोदी जी का सपना था कि डिजिटल इंडिया से भ्रष्टाचार खत्म होगा, शिक्षा सस्ती होगी, और गाँव-गाँव तक सरकार पहुँचेगी। लेकिन आज 2025 में हालत ये है कि गाँवों में इंटरनेट की स्पीड 2G से भी कम है, और भ्रष्टाचार? वो तो अब ऑनलाइन हो गया है! लगता है, ये शब्दों का जादू था, जो हमें सपनों की दुनिया में ले गया, लेकिन असलियत में छोड़ आया।

गाँव में 4G: सपना या मजाक?

डिजिटल इंडिया का सबसे बड़ा वादा था 4G इंटरनेट हर गाँव में। लेकिन हमारे गाँव के रमेश भैया ने तो कहा, “भाई, 4G तो दूर, 2G भी आधे घंटे में गायब हो जाता है!” हahaha, रमेश भैया, शायद आपका नेटवर्क टावर चाय पीने चला गया! एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 तक भारत के सिर्फ 40% गाँवों में 4G कनेक्टिविटी थी, और बाकी 60% अभी भी धीमी स्पीड से जूझ रहे हैं। तो क्या ये 4G गाँवों तक पहुँचा, या बस मंच पर एक शानदार जुमला था?

एक बार तो हमारे गाँव में 4G टावर लगा। लोग खुशी से नाचने लगे, लेकिन अगले दिन बिजली चली गई। रमेश भैया ने कहा, “अब तो 4G का मतलब 4 घंटे बिजली का इंतज़ार!” हास्यास्पद है, लेकिन सच्चाई यही है। गाँवों में बिजली की अनियमितता और इंटरनेट की कमी ने डिजिटल इंडिया को हवा-हवाई बना दिया। लगता है, ये सपना तो मंच पर ही अच्छा लगता है, गाँव में नहीं!

स्मार्टफोन: हाथ में सपना, जेब में खालीपन

मोदी जी ने कहा था, “हर हाथ में स्मार्टफोन।” और देखते ही देखते मार्केट में सस्ते चीनी फोन बिकने लगे। हमारे गाँव की चाची ने भी 2000 रुपये में एक स्मार्टफोन खरीदा, लेकिन जब वाई-फाई नहीं चला, तो वो बोली, “ये तो स्मार्ट नहीं, डंब फोन है!” हahaha, चाची जी, आपकी बात सही है। स्मार्टफोन तो आ गए, लेकिन इंटरनेट नहीं, तो ये बस एक शोपीस बनकर रह गया।

एक गंभीर मुद्दा ये है कि स्मार्टफोन खरीदने की होड़ में लोग कर्ज़ में डूब गए। एक एनजीओ की रिपोर्ट कहती है कि ग्रामीण इलाकों में 20% लोग स्मार्टफोन के लिए कर्ज़ लिया, लेकिन इंटरनेट न होने से इसका फायदा नहीं मिला। तो क्या डिजिटल इंडिया ने गाँवों को स्मार्ट बनाया, या बस जेब खाली कर दी?

डिजिटल पेमेंट: भूतनाथ का खेल

डिजिटल इंडिया का एक और वादा था कैशलेस इकोनॉमी। नोटबंदी के बाद पीएम ने कहा, “अब डिजिटल पेमेंट से भ्रष्टाचार खत्म होगा।” लेकिन हमारे गाँव के वर्मा जी ने तो कहा, “भाई, मेरे यहाँ नेट नहीं, तो पेमेंट कैसे करूँ? क्या भूतनाथ से माँगूँ?” हahaha, वर्मा जी, शायद भूतनाथ भी डिजिटल पेमेंट नहीं जानता! गाँवों में नेटवर्क की कमी और डिजिटल साक्षरता की कमी ने इस सपने को अधूरा छोड़ दिया।

एक बार तो वर्मा जी ने Paytm से पैसे भेजने की कोशिश की, लेकिन नेटवर्क ड्रॉप हो गया, और पैसे उसी में अटक गए। बाद में पता चला कि पैसे किसी और के अकाउंट में चले गए! तो क्या डिजिटल पेमेंट ने भ्रष्टाचार खत्म किया, या बस नया भूतनाथ बना दिया?

शिक्षा और स्वास्थ्य: डिजिटल सपने का धोखा

डिजिटल इंडिया का एक लक्ष्य था ऑनलाइन शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ। लेकिन हमारे गाँव के स्कूल में तो टीचर ही नहीं, फिर ऑनलाइन क्लास कैसे? रमेश भैया की बेटी ने कहा, “पापा, टीचर ऑनलाइन नहीं आते, तो मैं YouTube पर गाने सुनती हूँ!” हahaha, रमेश भैया, आपकी बेटी तो डिजिटल इंडिया का सही इस्तेमाल कर रही है! लेकिन सच्चाई ये है कि 2023 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण स्कूलों में सिर्फ 30% बच्चों के पास ऑनलाइन पढ़ाई की सुविधा थी।

स्वास्थ्य में भी हालात वैसे ही हैं। गाँवों में डॉक्टर नहीं, और ऑनलाइन कंसल्टेशन के लिए इंटरनेट नहीं। एक बार तो चाची जी ने ऑनलाइन डॉक्टर से सलाह ली, लेकिन नेटवर्क ड्रॉप होने से डॉक्टर ने कहा, “आपको सर्दी है या बुखार, ये तो नेट बताएगा!” तो क्या डिजिटल इंडिया ने शिक्षा और स्वास्थ्य को बेहतर किया, या बस एक और जुमला जोड़ दिया?

बेरोजगारी: डिजिटल जॉब का इंतज़ार

मोदी जी ने कहा था कि डिजिटल इंडिया से नौकरियाँ आएँगी। लेकिन हमारे गाँव के युवा आज भी फोन पर गेम खेलते हैं, क्योंकि जॉब नहीं मिली। एक एनएसएसओ रिपोर्ट कहती है कि 2024 में बेरोजगारी दर 8% से ऊपर पहुँच गई, खासकर ग्रामीण इलाकों में। रमेश भैया ने तो कहा, “डिजिटल इंडिया से तो सिर्फ डिजिटल बेरोजगारी आई है!” हahaha, रमेश भैया, आपकी बात में दम है।

डिजिटल इंडिया के तहत स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने की बात हुई, लेकिन गाँवों में इंटरनेट और ट्रेनिंग की कमी ने इसे प्रभावित किया। एक युवा ने बताया, “मैंने ऑनलाइन कोर्स किया, लेकिन नेटवर्क की वजह से हाफ कोर्स छूट गया। अब जॉब कहाँ से लाऊँ?” तो क्या डिजिटल इंडिया ने नौकरी दी, या बस सपने बेचे?

इंफ्रास्ट्रक्चर: टावर का तमाशा

डिजिटल इंडिया के लिए इंटरनेट टावर लगाने का वादा था। लेकिन हमारे गाँव में टावर लगा, पर बिजली नहीं। शर्मा जी ने तो कहा, “ये टावर तो सजावट का सामान बन गया!” हahaha, शर्मा जी, आप सही कह रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में 50% टावर बिजली की कमी से खराब पड़े हैं। तो क्या डिजिटल इंडिया का इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत हुआ, या बस मंच पर दिखावा था?

निष्कर्ष: 4G या जुमला?

तो दोस्तों, ये थी डिजिटल इंडिया की मज़ेदार कहानी। सपना तो सुंदर था – गाँव में 4G, हर हाथ में स्मार्टफोन, और डिजिटल क्रांति। लेकिन हकीकत में नेटवर्क की कमी, बिजली की अनियमितता, और बुनियादी सुविधाओं की कमी ने इसे जुमला बना दिया। बेरोजगारी, शिक्षा, और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं। शायद डिजिटल इंडिया का जादू मंच पर ही काम करता है, गाँवों में नहीं। तो अगली बार जब आप 4G की बात सुनें, तो जरा चेक कर लें – क्या ये सच्चाई है, या बस एक और हवा-हवाई सपना?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *